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मोफत पाठ्य पुस्तकातील ज्ञान गंगा

काही वर्षा पूर्वी महाराष्ट्र  सरकारने  शालान्त  परीक्षेपर्यंतच्या  विद्यार्थ्यांना  सर्व  पाठयपुस्तके  मोफत  वाटण्याची  घोषणा  केली.  ती  अमलात  आणेपर्यंत  आता  फक्त  आर्थिकदृष्टया  कमकुवत  वर्गासाठीही  लागू  करण्याची  घोषणा  नंतर  केली .  मोफत पाठ्य पुस्तक योजने वर त्या काळी बरीच चर्चा झाली. मला माझे शालेय जीवन आठवले.

सर्व  माध्यमिक  विद्यार्थ्यांना  मोफत  पाठयपुस्तके  मिळणार,  हे  ऐकून  हेवा  वाटला.  25-30  वर्षांपूर्वी  शाळांची  स्थिती  फारच  वेगळी  होती.  आज  बालवाडीच्या  मुलाच्या  दफ्तरात  छान  छान  रंगीत  पाठयपुस्तके  आहेत.  त्या  काळी  आम्ही  चौथीपर्यंत  पुस्तक  व  वहीचे  दर्शन  कधी  घेतले  नाही.  नगरपालिकेच्या  शाळेत  त्या  वेळी  सर्वच  गरीब  कनिष्ठ  वर्गातील  मुले  शिकत  होती.  धोतर,  शर्ट,  काळा  कोट  व  टोपी  घातलेले  आमचे  त्यावेळचे  गुरुजी  आम्हाला  स्लेट  पाटी  (दगडी  पाटी)  वर  अक्षरे  गिरवायला  लावायचे.  या  पाटीवरच  मराठी,  गणित,  शास्त्र,  चित्रकला  या  सर्व  विषयांचे  धडे  गिरवले  जात.  ‘धडे  गिरवणे’  या  वाक्यप्रयोगातच  पेन्सिल  व  पाटीचा  संबंध  पूर्वापार  चालत  आलेला  असावा.  खेडयातील  लोक  धुळाक्षरे  गिरवीत.  खेडयात  धूळ  चिक्कार.  शाळाही  बाहेर  उघडया  मैदानावर  भरवली  जात  असे.  त्यामुळे  तेथील  मातीच्या  माणसांचा  शिक्षणाशी  संबंध  आला,  तोही  मातीशीच.


हा लेख मराठीसृष्टी (www.marathisrushti.com) या वेबसाईटवर प्रकाशित झाला आहे. लेख शेअर करायचा असल्यास लेखकाच्या नावासह शेवटपर्यंत संपूर्णपणे शेअर करावा...

प्राथमिक  शाळेत  त्यासाठी  स्लेट  पाटीचे  अत्यंत  महत्त्व  होते.  गावातील  गुजराती  दुकानदारा कडे  स्लेट  पाटी  विकत  मिळत  असे.  स्लेट  पाटी  घरी  आणली  की  प्रथम  ती  पाण्याने  स्वच्छ  धुतली  जाई.  या  पाटीवर  शुभारंभ  हा  सरस्वती  देवतेच्या  मंत्राने  होई.  शाळेतील  पहिला  दिवस  स्पष्टपणे  आठवत  नाही;  परंतु  स्लेट  पाटीची  कडी  दोन  बोटांत  अडकून  शाळेत  जाणारी  चिमुकली  आकृती  डोळयांसमोर  येते.  पहिल्या  दिवशी  प्रार्थना  झाली  की,  पाटीवर  रेखाटलेले  सरस्वती  मंत्र  गुरुजींना  दाखविले  जाई.  गुरुजींच्या  पायावर  डोके  ठेवले  की,  शाळेतला  पहिला  दिवस  सुरू  होई.  त्या  काळी  पाटी  विकत  घ्यायला  काही  पालकांकडे  पैसे  नसायचे.  त्यांची  मुले  पाटी  असलेल्या  ‘श्रीमंत’  मुलांच्या  शेजारी  बसायची.  त्या  काळी  पाटी  घेण्याइतपत  आमची  आर्थिक  परिस्थिती  बेताची  होती.  त्यामुळे  माझ्या  पाटीवर  काही  गरीब  मित्रांनी  शिक्षण  ‘शेअर’  केल्याचे  स्मरणात  आहे.

माझ्या  स्लेट  पाटीवरील  शिक्षणातील  भागीदार  मुस्लिम  मित्र  ‘समद’  त्या  काळी  यतीमखान्यात  (अनाथालय)  राहत  होता.  समद  फारच  खोडकर  व  दांडगाई  करणारा  माझा  मित्र.  एकदा  आमच्या  भांडणात  त्याने  माझी  पाटीच  फोडून  टाकली.  त्यामुळे  घरी  मला  चांगलाच  चोप  मिळाला.  ”पाटी  नीट  सांभाळता  येत  नाही  का  ?  रोज  नवीन  पाटी  घ्यायला  आपण  जहागीरदार  आहोत  काय  ?  आता  बसा  बिन  पाटीचे!”  असे  उद्गार  वडिलांकडून  महिनाभर  ऐकावे  लागले.  आईच्या  मागे  सारखा  लकडा  लावल्यानंतर  मला  त्यांनी  परत  नवीन  पाटी  घेऊन  दिली.

पाटी  नव्हती  तोपर्यंत  समद  व  मी  दोघेजण  दुसऱ्या  ‘श्रीमंत’  पाटीवाल्या  मुलाशेजारी  बसू  लागलो.  नंतर  आपण  केलेली  चूक  समदला  कळून  आली  होती.  माझ्या  शाळेत  सर्वच  जातीधर्माची  मुले  होती.  नगरपालिका  किंवा  जिल्हा  परिषदेच्या  शाळेत  तुम्हाला  लहान  मुलांमधील  ‘सर्वधर्मसमभाव’  दिसून  येईल.  जेवणाचे  डबे  व  पाटया  सहकार  पध्दतीने  आणले  जात.  घरी  आईला  सांगितले  की,  माझ्या  डब्यात  दोन  पोळया  जास्तच  घातल्या  जात  होत्या.  काही  वेळा  गरीब  भुकेल्या  मित्रांसाठी  चोरून  खिशात  बऱ्याच  पोळया  घडया  करून  नेल्याचे  स्मरते.  पाटीवर  सतत  गिरवल्यामुळे  आमचे  अक्षर  सुधारले  जाई.  गुरुजी  खुर्चीवर  बसलेले  व  आम्ही  बरेच  विद्यार्थी  सोडवलेले  गणित  त्यांना  दाखवण्यासाठी  पाटी  घेऊन  गर्दी  केल्याचे  दृश्य  आठवते.  त्या  काळी  सहामाही  व  वार्षिक  परीक्षा  पूर्ण  पाटीवरच  दिली  आहे.

प्राथमिक  शाळा  सोडल्यानंतर  माध्यमिक  शाळेत  प्रवेश  घेतला.  त्या  वेळी  प्राथमिक  शाळा  या  बहुतेक  नगरपालिका  किंवा  जिल्हा  परिषदेच्या  शिक्षण  खात्यामार्फत  चालविली  जात  असे.  माध्यमिक  शाळेत  जाताना  सोबत  पाटी  नव्हती.  त्यामुळे  खूपच  चुकल्याप्रमाणे  वाटत  राही.  पाटी  जाऊन  त्या  वेळी  हातात  वही  आली.  त्या  वेळी  दोनच  वह्या  होत्या.  एक  आखीव  व  दुसरी  पूर्ण  कोरी  वही.  आखीव  वहीत  सर्वच  विषय  व  कोऱ्या  पानाच्या  वहीत  चित्रकला  व  भूमितीला  स्थान  होते.  या  वह्याही  नेहमी  नवीन  असतील,  अशी  शक्यता  फारच  कमी  होती.  बहुतेक  वेळा  मोठया  भावाच्या,  बहिणीच्या  उरलेल्या  वहीतील  कोरी  पाने  वेगळी  केली  जात  असत.

या  ‘शिळया’  पानांची  वही  घरीच  तयार  केली  जात  असे.  या  जुन्या  वहीच्या  पुठ्ठयावर  आम्ही  देवांची  सुंदर  रंगीत  चित्रे  चिकटवत  होतो.  आता  वह्यांवर  क्रिकेट,  कार्टून,  निसर्गचित्रे,  प्राणी,  पक्षी  यांची  धम्माल  गर्दी  होत  आहे.  कॉलेजला  जाताना  याच  वह्यांवर  हिंदी  सिनेमातील  नटनटयांचे  आकर्षक  चित्रे  झळकू  लागली.

शालेय  जीवनातील  वह्यांच्या  सर्वात  मागील  पानावर  लिहिलेले  साहित्य  फारच  मजेदार  व  अर्थपूर्ण  असे.  त्यातील  काही  नमुने-  ”सराची  पँट  फाटकी  आहे,  सोन्याच्या  नाकाला  शेंबूड  आहे,  उद्या  मी  ट/ठ्ठपला  जाणार  आहे,  कँटीनमध्ये  मिसळ  चांगली  आहे,  काळे  सर  क्रॅक  आहेत;  किंवा  हिंदी  मराठी  गीतांमधीठ्ठल  काही  ओळी  खरडलेल्या  असत.”  सरांच्या  ताब्यात  वही  जाऊ  नये,  याची  कठोर  खबरदारी  घेतली  जाई.  वहीच्या  प्रथम  पानांवर  श्रीगणेशाय  नम:  व  अनेक  देवतांना  नमस्कार  लिहिलेले  असत.  परंतु  शेवटच्या  पानावर  चावट,  वात्रट  व  विनोदी  वाक्यांची  रेलचेल!

‘माध्यमिक  शाळेत  इंग्रजी  व  गणित  ही  दोनच  पुस्तके  आमच्या  दृष्टीने  महत्त्वाची  होती.  या  दोन  विषयांनी  आम्हा  सर्वांनाच  खूप  छळले  आहे!  ही  दोन  पुस्तके  घरच्या  मोठया  भावंडाकडून  प्रवास  करीत  आमच्यापर्यंत  पोहोचत.  या  जुन्या  पुस्तकांवर  लाल  पेन,  पेन्सिल  यांनी  रांगोळी  काढलेली  व  त्यामधून  मूळ  छापील  गणित  शोधणारे  महाकर्म  कठीण  कार्य.  यामध्ये  गणितात  चूक  झाली  की  गुरुजी  रागाने  आमच्या  वहीत  लाल  शाईचा  भोपळा  देत.  फारच  क्वचित  प्रसंगी  वहीत  ”फारच  छान,  उत्तम,  शाब्बास”  असा  शेरा  दैवयोगामुळे  मिळत  असे.  अशा  वहीचे  प्रदर्शन  संपूर्ण  घरात  व  मित्रमंडळींत  केले  जाई.

शाळेतल्या  लायब्ररीत  पाठयपुस्तके  क्वचित  प्रसंगी  दिली  जात  होती.  गोष्टींच्या  पुस्तकांची  पेटी  वर्गावर  आली  की  आमची  झुंबड  उडत  असे.  सानेगुरुजी,  विवेकानंद,  शिवाजी  महाराज,  इसापनीती,  पंचतंत्र,  बिरबल,  हातीमताई  व  जादूच्या  पुस्तकांचा  भरगच्च  खजिना  हाती  पडत  नसे.  आज  चौकाचौकात  जून  महिन्याच्या  सुरुवातीला  वह्या-पुस्तकांचे  मंडप  रुजू  लागले  आहेत.  काही  शाळेतील  विद्यार्थ्यांना  शाळेमार्फत  गणवेश,  पुस्तके,  वह्या  सर्वच  काही  उपलब्ध  होत  आहे.  त्याकरिता  पालक  भरपूर  पैसे  मोजतात.  परंतु  या  सु)त  सुविधेमध्ये  शाळेतील  शिक्षणाची  जादू  हळुहळू  कमी  होत  आहे.  आजचा  विद्यार्थी  सीडी,  कॉम्)युटर,  इंटरनेट  व  टीव्ही  माध्यमातील  पाठयपुस्तक  व  वह्यांच्या  खऱ्या  आनंदाला  मुकला  आहे.

बाजारातील  जीवघेणी  स्पर्धा,  मार्कांचे  तुंबळ  युध्द,  प्रवेश  परीक्षेतील  प्रचंड  गोंधळ  या  सर्वच  गदारोळात  शिक्षणातील  निरागस  आनंद  हरवला  आहे.  आज  कोणी  विद्यार्थी  सार्वजनिक  वाचनालयात  वर्तमानपत्र,  मासिक  वाचत  उभा  असलेला  दिसत  नाही.  लहानपणी  आमच्या  गावात  मुलांसाठी  चिमुकले  पुस्तकांचे  वाचनालय  चालवले  जाई.  या  वाचनालयात  चांदोबा,  वेताळ,  कॉमिक  पुस्तके  वाचण्यात  आमचा  काही  वेळ  आनंदात  पार  पडे.  वाचताना  म्हातारेबाबा  खारे  शेंगदाणे,  फुटाणे,  गोळया,  चॉकलेटही  देत  असत.

करिअर  करण्याच्या  लढाईत  आपली  तलवार,  ढाल  फक्त  पाहिली  जाते.  परंतु  सामूहिक  शिक्षणातील  निरागस,  नि:स्वार्थी  त्यागभावना  शिक्षण  क्षेत्रात  लोप  पावत  आहे.  आमचे  शिक्षक  आम्हा  गरीब  मुलांची  मोफत  शिकवणी  घेत.  वह्या-पुस्तकांची  मदत  केली  जाई.

महाराष्ट्र  सरकारने  माध्यमिक  शाळेच्या  मुलांना  पहिली  ते  दहावीपर्यंत  मोफत  वह्या  व  पाठयपुस्तके  जरूर  द्यावीत.  यामुळे  गरीब  कुटुंबातील  हुशार  मुलांचे  आशीर्वाद  मिळतील.

सर्व  शिक्षा  अभियान,  मूल  तेथे  शिक्षण,  आश्रमशाळा,  वस्तीशाळा,  पार  शाळा,  साखर  कारखान्यातील  ऊस  कामगारांच्या  मुलांसाठी  साखरशाळा,  रात्रशाळा  या  सर्वच  योजना  यशस्वी  झाल्या  पाहिजेत.  उद्याचा  समर्थ  भारत  शाळेतील  सुख-सुविधेवर  अवलंबून  आहे.  त्यामुळे  प्रत्येक  मुलाच्या  हाती  वही  व  पुस्तक  असणे  आवश्यक  आहे!

— विजय प्रभाकर नगरकर 

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About विजय प्रभाकर नगरकर 10 Articles
विजय प्रभाकर नगरकर अहमदनगर, महाराष्ट्र सम्प्रतिः सेवानिवृत्त राजभाषा अधिकारी बीएसएनएल, अहमदनगर, महाराष्ट्र मातृभाषा: मराठी जन्म स्थल: नेवासा (महाराष्ट्र) जन्म तिथि- 16/02/1960 हिंदी अध्ययन मंडल नामित सदस्य: पुणे विश्वविद्यालय (1995-2000) औरंगाबाद विश्वविद्यालय (2000-2005) राष्ट्रीय दूरसंचार प्रशिक्षण संस्थान,जबलपुर सदस्य सचिव: नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, अहमदनगर, महाराष्ट्र राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय,भारत सरकार (वर्ष 2000-2020) पुरस्कार: 1.राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय, मुम्बई क्षेत्रीय पुरस्कार 2015 2.नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के सदस्य सचिव नाते उत्कृष्ठ हिंदी कार्य हेतु तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा प्रमाणपत्र से सम्मानित - 2014 3. गृह पत्रिका 'कलश' बीएसएनएल, अहमदनगर के उत्कृष्ट संपादन हेतु राजभाषा विभाग,गृह मंत्रालय,मुम्बई से पुरस्कार। प्रकाशित रचनाएँ: 1. 1857 का संग्राम (मराठी से हिंदी में अनूदित) एनबीटी, नई दिल्ली 2. समकालीन भारतीय साहित्य (साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली) पत्रिका में अनुदित मराठी कविताएँ प्रकाशित 3. तकनीकी हिंदी, सूचना प्रौद्योगिकी और हिंदी संबंधित अनेक लेख राजभाषा भारती, विश्व हिंदी, अभिव्यक्ति, रचनाकार में प्रकाशित। 4. राजभाषा सहायिका,बीएसएनएल 5. मराठी पुस्तक 'सचित्र संत महिपती' 6. काव्य संगम अनुवाद संपादक गृहपत्रिका 'कलश' बीएसएनएल, अहमदनगर ( 1998-2012) विशेष रुचि: तकनीकी हिंदी, अनुवाद और राजभाषा हिंदी प्रचार-प्रसार हिंदी ब्लॉग: राजभाषामानस vpnagarkar@gmail.com +919422726400 +919657774990

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